Allahabad!
हम इलाहाबाद रहते हैं
हम इलाहाबाद रहते हैं,
जहाँ दिलों में प्यार रहता है,
गंगा की लहरों के संग-संग
हर ख़्वाब बेशुमार रहता है।
संगम की पावन धरती पर
हर मज़हब का सम्मान रहे,
मंदिर की घंटी, अज़ाँ की सदा—
दोनों में हिंदुस्तान रहे।
यहाँ अदब की खुशबू महके,
यहाँ कलम उम्मीद जगाए,
जो टूटे हैं जीवन-पथ पर,
उनको फिर चलना सिखाए।
हम मुश्किल से हारें कैसे,
जब हौसला हमारे साथ रहे,
अँधियारे चाहे जितने हों,
दिल में उजला प्रभात रहे।
इलाहाबाद की माटी कहती—
“नफ़रत को दिल में मत पालो,
इंसाँ हो तो इंसाँ से मिलो,
प्रेम का दीपक मिलकर बालो।”
हम इलाहाबाद रहते हैं,
इस पर हमको नाज़ बहुत,
यह शहर नहीं, इक सोच है ऐसी—
जिसमें बसता है हिंदुस्तान बहुत।
चलते रहना, बढ़ते रहना,
राह कठिन हो तो क्या ग़म है,
जिसके दिल में सत्य का सूरज,
उसके आगे कहाँ तम है।
हम इलाहाबाद रहते हैं—
उम्मीद हमारी पहचान रहे,
गंगा-जमुनी इस तहज़ीब का
हर युग में ऊँचा मान रहे।
- Sahitya Prabhakar,
Sher Lakhnavi Prof. Mohd Ossama

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