लखनऊ की सरज़मीं!
लखनऊ की सरज़मीं, ये लखनऊ सरज़मीं लखनऊ की सरज़मीं, ये लखनऊ सरज़मीं, अदब की है खुशबू, मोहब्बत की ज़मीं। जहाँ बात में मिठास, लहजे में प्यार है, हर दिल में तहज़ीब का इक संसार है। गोमती के किनारे जो सपने सँवरते, यहाँ टूटे हुए दिल भी हँसकर निखरते। इमामबाड़ों की शान, रूमी दरवाज़े की आन, हर पत्थर सुनाता है इतिहास की दास्तान। यहाँ कृष्ण की बाँसुरी, अज़ान की सदा, मिलकर सुनाती है इंसानियत की दुआ। मंदिर की घंटी हो या मस्जिद की अज़ान, लखनऊ सिखाता है—सबसे पहले इंसान। नवाबी विरासत को दिल में सँजोकर, चलते हैं लोग यहाँ नफ़रत को छोड़कर। क़लम जब उठे तो उजाला करे, हर शब्द किसी दिल को निराला करे। इल्म हो तो चराग़ों की कतारें जलें, हौसले हों तो पत्थर भी राहें बनें। जो गिरकर सँभल जाए, वही कामयाब, लखनऊ देता है जीने का यही जवाब। न कोई छोटा यहाँ, न कोई बड़ा, मोहब्बत का रिश्ता है सबसे बड़ा। अदब इसकी पहचान, वफ़ा इसका ईमान, इसी से रोशन रहे लखनऊ का नाम। लखनऊ की सरज़मीं, ये लखनऊ सरज़मीं, तू उम्मीद की धूप, तू दुआ की नमी। तेरे आँगन से उठता रहे प्यार का कारवाँ, तेरी मिट्टी से महके सदा हिंदुस्तान। — साहित्य प्रभाक...